मन की बात - सर्वजीत Mann Ki Baat- Poem in Hindustani by Sarvajeet D Chandra

 मन की बात - सर्वजीत


कैसे दिलासा दूँ मैं तुमको  

कैसे दुःख का भागीदार बनूँ

तुम्हारी व्यथा को समझूँ कैसे

कैसे पीड़ा का निस्तार करूँ



गंगा में लावारिस ,बहते शव के संग

डूबती मानवता का कैसे उत्थान करूँ

आख़िरी यात्रा की मर्यादा छिन्न ना हो 

देह का कैसे उपयुक्त संस्कार करूँ



मूक तानाशाह खून पीते दरिंदों 

के ख़िलाफ़ बुलंद कैसे आवाज़ करूँ

शमशान बनाने वाले, लुब्ध भेड़ियों से 

देश को कैसे उन्मुक्त, आज़ाद करूँ



रोज़ सवेरे उठकर व्हाट्सैप् पर बैठे 

नयी शोक सभा का इंतज़ार करूँ 

एम्बुलेंस से तेज दौड़ती है धड़कन

ख़ैरियत के लिये कैसे फ़रियाद करूँ



अनाथ बच्चों के डरे, सहमे से चेहरे

टूटे घर को कैसे फिर आबाद करूँ

अस्पताल में दम तोड़ती माँ, पड़ोसी

कैसे अलविदा कहूँ, आख़िरी बार मिलूँ



तुम थके हो, भूखे, टूटे, अकेले

कैसे हौसला दूँ, दो पल का यार बनूँ

कुछ तसल्ली, सुकून दूँ तुमको

कुछ दर्द बाँटू, एक हमराज़ बनूँ



साँस बाक़ी है, है जीने की तमन्ना

कैसे ऑक्सीजन दूँ ,तेरा उपचार करूँ 

सड़क पर दम तोड़ ना दे इंसानियत

कैसे मदद करूँ, मुश्किलें आसान करूँ



कैसे बदलूँ यह क़हर का मौसम

घनी रात में दीपक का आवाहन करूँ

गीत गाता हूँ  एक नयी सुबह का 

मन की बात बोलूँ, इक इंसान बनूँ





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